संस्कृत भाषा में क्रिया पदों की रचना एक अत्यंत वैज्ञानिक और गणितीय पद्धति पर आधारित है। धातुओं से पदों का निर्माण करते समय विभिन्न सूत्रों का एक निश्चित क्रम में प्रयोग होता है जिसे रूपसिद्धि कहा जाता है। भ्वादिगण की भू धातु से प्रथम पुरुष एकवचन में भवति पद की सिद्धि इस प्रक्रिया को समझने का सर्वोत्तम उदाहरण है।
लट् लकार और तिङ् प्रत्यय का विधान
वर्तमान काल की विवक्षा में वर्तमाने लट् सूत्र से भू धातु से परे लट् लकार का विधान किया जाता है। इसके पश्चात तिप्तस्झि आदि अठारह तिङ् प्रत्ययों में से प्रथम पुरुष एकवचन की विवक्षा में तिप् प्रत्यय आता है। अनुबंध लोप करने पर भू के साथ ति शेष रहता है।
शप् विकरण और गुण कार्य का संयोजन
कर्तरि शप् सूत्र से धातु और प्रत्यय के मध्य शप् विकरण का आगम होता है जिसका अ भाग शेष बचता है। इसके बाद सार्वधातुकार्धधातुकयोः सूत्र द्वारा भू के उकार का सार्वधातुक प्रत्यय परे रहते गुण होकर भो बन जाता है। इस प्रकार भो अ ति स्थिति निष्पन्न होती है।
अयादि संधि और अंतिम पद निष्पत्ति
एचोऽयवायावः सूत्र द्वारा भो के ओकार के स्थान पर अव् आदेश किया जाता है। वर्ण सम्मेलन करने पर भवति पद पूर्ण रूप से सिद्ध हो जाता है। इस क्रमिक पद्धति से अध्ययन करने पर किसी भी धातु के रूपों को सरलता से समझा जा सकता है।
